Pathania Lt Col- 1947 का भारत-पाक युद्ध की लेफ्टिनेंट कर्नल अनंत सिंह पठानिया की सच्ची कहानी

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-1/5 गोरखा राइफल्स की पहली टुकड़ी ने जम्मू कश्मीर के ज़ोजिला ऑपरेशन में जीत हासिल की। गोरखा राइफल्स की इस अप्रत्याशित उपलब्धि का श्रेय लेफ्टिनेंट कर्नल ए.के. एस। पठानिया जाता है। उनकी अजेय मानसिक दृढ़ता और सक्षम नेतृत्व ने इस टुकड़ी को जीत दिलाई। मेजर जनरल अनंत सिंह पठानिया एमवीसी , एमसी (25 मई 1913 – 19 दिसंबर 2007) एक सम्मानित भारतीय सेना के जनरल थे , द्वितीय विश्व युद्ध में मिलिट्री क्रॉस प्राप्त करने वाले पहले भारतीय , वे गोरखा राइफल्स के पहले भारतीय कमांडिंग ऑफिसर भी थे।

Lt Col की सच्ची कहानी

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Lt Col Pathania के बारे में महत्वपूर्ण तथ्य

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  • जन्म – 25 मई 1913 , कांगड़ा जिला , पंजाब प्रांत , ब्रिटिश राज (अब हिमाचल प्रदेश , भारत)

  • मृत्यु – 19 दिसंबर 2007 (उम्र 94) धर्मशाला , हिमाचल प्रदेश , भारत

  • निष्ठा – ब्रिटिश भारत (1936-) , भारत (1947-1965)
  • सेवा- ब्रिटिश भारतीय सेना , भारतीय सेना
  • सेवाकाल – 1936-1965

  • पद – भारतीय सेना के मेजर जनरल.svg मेजर जनरल

    लड़ाई- वज़ीरिस्तान ,द्वितीय विश्व युद्ध ,पूर्वी अफ्रीकी अभियान ,केरेन की लड़ाई ,बर्मा अभियान,1947 का भारत-पाकिस्तान युद्ध ,ऑपरेशन बाइसन,चीन-भारतीय युद्ध

  • पुरस्कार – महावीर चक्र , मिलिट्री क्रॉस

Lt Col Pathania -1947 का की लेफ्टिनेंट कर्नल अनंत सिंह पठानिया की सच्ची कहानी

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1947 में भारत देश आजाद हुआ। एक तरफ से साम्रदायिक हंगामे हो रहे थे और फिर पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर पर हमला बोल दिया। अभी, लेफ्टिनेंट कर्नल अनंत सिंह पठानिया 1/5 गोरखा राइफल्स में पहले भारतीय कमांडिंग ऑफिसर नियुक्त हुए। एक कमांडिंग ऑफिसर के रूप में, उन्होंने दिल्ली में दंगा ग्रस्त इलाकों के लोगों की और विभाजन के बाद भारत आये शरणार्थियों की मदद करने का दायित्व ग्रहण किया। लेफ्टिनेंट कर्नल अनंत सिंह पठानिया के परिवार में सेना में भर्ती होना गर्व की बात थी । उनके दादा, नाना, पिता सभी सेना में थे। अनंत सिंह पठानिया भी पारिवारिक रीति से आगे बढ़े और सेना में भर्ती हो गए।

22 अक्टूबर 1947 को, पाकिस्तान ने जम्मू और कश्मीर पर हमला किया, क्योंकि पाकिस्तान को उम्मीद थी कि महाराजा हरि सिंह जम्मू कश्मीर को भारत में शामिल कर देंगे । महाराजा हरि सिंह ने पाकिस्तानी हमले से समझ लिया कि जम्मू-कश्मीर को सुनिश्चित करना है। उन्हें अपने राज्य को भारत में जोड़ना चाहिए और 26 अक्टूबर 1947 को महाराजा हरि सिंह ने भारत में जम्मू और कश्मीर को जोड़ते हुए, अधिमिलन पत्र पर हस्ताक्षर कर दिया।

पाकिस्तान इस आधार पर उपस्थिति को चुनौती नहीं दे सका कि क्योंकि अधिमिलन तय करने का अधिकार केवल रियासतों के शासकों को था I अब पाकिस्तान और बौखला गया और के साथ मिलकर लूट पाट और नरसंहार करती पाकिस्तानी सेना और भी उग्र हो गयी l।

भारत-पाकिस्तान युद्ध 1947 से 1949 तक जम्मू-कश्मीर में चला और Lt Col Pathania की यूनिट को भी वहां युद्ध के लिए रवाना कर दिया गया। नवंबर 1948 में, द्रास और कारगिल की ओर बढ़ने वाली भारतीय सेना को पिंड्रास गॉर्ज में रुकने की जरूरत थी क्योंकि वहां पाकिस्तानी सेना सामूहिक रूप से उपलब्ध थी।

भारतीय सेना ने निष्कर्ष निकाला कि गुमरी नाला के उत्तर की ओर, पिंडरों से पहले की चोटी को कब्ज़ा किया जाना चाहिए और इस गतिविधि को ऑपरेशन बाइसन नाम दिया गया।

1/5 गोरखा राइफल्स को इस शिखर पर कब्जा करने की जिम्मेदारी दी गई थी, जिसे लेफ्टिनेंट कर्नल अनंत सिंह पठानिया ने संचालित किया था। बाइसन को जम्मू-कश्मीर में लड़ाई में सबसे अधिक मुश्किल और चुनौतीपूर्ण माना जाता है। यह विशेष रूप से भारतीय सशस्त्र बल के लिए प्रगति का एक विकल्प था, इस आधार पर कि उस बिंदु से दुश्मन को कुचला और हमला किया जा सकता था। 

Lt Col Pathania ने अपनी सूझ बूझ से दुश्मन की रणनीति का पहले सैनिक निरिक्षण किया l दुश्मनों की सेना की क्षमता, उसकी रणक्षेत्र में स्तिथि, संभावित आक्रमण के स्थान आदि का आँकलन किया l इस सबकी टोह लेने के बाद उन्होंने अपनी टुकड़ी के साथ 14 नवम्बर, 1948 को दुश्मन पर धावा बोला ।

पाकिस्तानी सेना की ओर से भरी गोला बारी की गयी, उन्होंने करारा जवाब दिया और जीत हासिल की। यह इस संघर्ष का निर्णायक क्षण था। यहां खास बात यह है कि लेफ्टिनेंट कर्नल पठानिया ने दुश्मन के ठिकानों का निरिक्षण हो या उस आक्रमण, सभी जगह खुद अपनी टुकड़ी का नेतृत्व किया l अपने सैनिकों के लिए Lt Col Pathania बहुत बड़ी प्रेरणा थे, उनके प्रोत्साहन से सैनिकों का मनोबल और भी बढ़ गया।

Lt Col Pathania ने अपने परिश्रम, कार्यप्रणाली और साहस के साथ इस निर्णायक रूप से महत्वपूर्ण चोटी पर विजय प्राप्त की, बाद में उनके सम्मान में चोटी को अनंत हिल्स के रूप में जाना जाता है।

लेफ्टिनेंट कर्नल पठानिया को उनकी वीरता, दूरदर्शिता, प्रेरणादायक नेतृत्व और निडर साहस के लिए महावीर चक्र प्रदान किया गया था।

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